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मुर्दों को भी चाहिए पैसे!

Posted On: 5 Feb, 2010 Others में

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कहते हैं कि मरने के बाद व्यक्ति खाली हाथ ही जाता है। सत्य है, पर शास्त्र बताते हैं कि मरनेवाले की आत्मा को तबतक शांति नहीं मिलती, जबतक उसका क्रियाक्रम ठीक ढंग से न किया जाए। बस, इसी का फायदा उठाते हैं डोम और पंडित। पंडित जी मरनेवाले परिवार से हजारों तो डोम भी सैकड़ों रुपए वसूल लेते हैं। अपनों के मरने के गम में सराबोर अनगिनत लोगों को इस आडम्बर को पूरा करने में जेवर व जमीन तक बेच देनी पड़ती है। 21वीं सदी में भी डोम श्मशान घाट का राजा बना हुआ है। बिहार की बात करें तो यहां कोई ऐसा श्मशान घाट नहीं है, जहां डोम मनमानी और रंगदारी न करते हों। यदि जेबें भरी न हों तो मृतक का शव जलाना मुश्किल नहीं असंभव है। अर्थात, मरने के बाद भी चाहिए हजारों-हजार रुपए, यानी शव…श्मशान…डोम…रुपए भी सत्य है।

प्रसंग एक : मनुष्य जीवन भर किसी व्यक्ति को चाहे कितना कष्ट क्यों न पहुंचाए परंतु उसके मरने के बाद धूमधाम से दाह संस्कार जरूर करता है। उसे डर रहता है कि कहीं उसकी आत्मा उसे तंग करना न शुरू कर दे। इस अंधविश्वास में लगभग सभी मनुष्य रहते हैं, जीते हैं। इसी का फायदा उठाते हैं डोम और पंडित। दाह-संस्कार के क्रम में पंडित जी बार-बार यह कहना नहीं भूलते कि दान में कमी होने पर मृतक की आत्मा भटकती रहेगी।

प्रसंग दो : एक हकीकत…पटना निवासी एक गरीब व्यक्ति की मौत एक माह पूर्व हो गई थी। सारे परिजन गम में डूबे थे। यहां कोई बुजुर्ग नहीं था। पड़ोसियों ने बताया कि मृतक को ले जाने के लिए आवश्यक सामान मंगवाना होगा। इस बीच झोले के साथ एक पंडित जी लंबे-लंबे डग भरते हुए कहीं से पधार गए। उनसे पूछा गया कि क्या-क्या मंगवाना है। इसपर, उन्होंने लंबी-चौड़ी सूची परिजनों को थमा दी। सामान आने के आद मृतक को जलाने के लिए गुलबी घाट पर ले जाया गया। पता चला कि पहले रजिस्ट्रेशन होता है। इसकी व्यवस्था सरकार की तरफ से की गई है, राशि भी कम लगती है। खैर, रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी करने के बाद परिजनों ने जलाने के लिए लकड़ी खरीदे। इसके बाद लकड़ी सजाने वालों से शुरू हुआ मोल-तोल। वह हजार के नीचे बात ही नहीं कर रहा था। इस परिवार के सदस्य एक-दूसरे से फुसफुसा रहे थे कि पैसे कहां से आएंगे? खैर घाट पर आए एक पड़ोसी से उधार लेकर इसकी भी व्यवस्था हुई। तबतक घाट का डोम लंबे-लंबे पग भरता पहुंचा। पंडित जी फुसफुसाए आग देने के लिए डोम ही दियासलाई जलाता है। डोम से कहा गया कि ‘भैया मेरे’ जरा दियासलाई जला दीजिए। डोम भड़का और कहा-पहले बीस हजार निकालो। परिजन भौंचक-उन्हें लगा कि बीस रुपए मांग रहा है। मृतक के एक बेटे ने दस-दस के दो नोट निकालकर डोम को दिए। डोम ने दोनों रुपए जमीन पर फेंक दिए और ‘गरजा’ भीख दे रहो हो क्या? वह आप से अब ‘तुम’ पर उतर गया था। इसी बीच एक अन्य मृतक की लाश पहुंची, जिसे देख उसकी आंखें चमकने लगीं। वह भागता-हांफता वहां पहुंचा। इस शव के साथ आनेवाले परिजन कुछ मालदार दिख रहे थे। इधर, चिता सजाये परिजन सोचने लगे कि अब शव कैसे जलाएं। पंडित जी फिर फुसफुसाये, दो हजार में पट जाएगा। परिजन बोले कहां से लाए इतने रुपए, खुद दियासलाई जला लेंगे। पंडित जी बोले, ऐसा अनर्थ न कीजिएगा। आत्मा भटकती रहेगी, आपलोग चैन से जी नहीं पाइएगा। इसके पश्चात यहां आए सभी पड़ोसियों से उधार लेने का सिलसिला शुरू हुआ। जीवन में कभी उधार न देनेवाले भी दो सौ उधार दे दिए। इस तरह दो हजार जमा किए गए। हजार विनती और हाथ-पैर जोडऩे के बाद डोम ने माचिस जलाई। सभी परिजन जाड़े में भी पसीने-पसीने हो गए। यह सोचकर कि क्या शव को जलाने के लिए भी इतनी मिन्नतें करनी पड़ती हैं। पुन: अगले दिन पंडित जी कई पन्ने की लिस्ट थमा दी। इसे पूरा करने में परिजनों को हजारों रुपए खर्च करने पड़े। किसी ने जेवर बेच डाले तो किसी ने उधार लिए। परंतु पंडित जी के बताये सारे पूजा-पाठ करवाए। यह सोचकर कि कहीं उनके अभिभावक की आत्मा न भटके।

प्रसंग तीन : सरकार को यह कानून तो बनाना ही चाहिए कि शव जलाने में इस तरह की सौदेबाजी न हो। घाटों पर चल रहे डोम के रंगदारी को खत्म करने की दिशा में कभी कोई कदम नहीं उठाया गया। माना कि धनी लोग अपनी इच्छा से लाखों खर्च कर देते हैं। परंतु वे कहां जाएं और किससे फरियाद करें, जो अत्यंत गरीब हैं। श्मशान घाट पर पूरी तरह डोम का वर्चस्व है।

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36 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ankit tyagi के द्वारा
April 10, 2011

rvi ji kya khub likha hai aapne, the truth which no one accepts in this world

Ashok Singh Bharat Dainik Jagran के द्वारा
September 9, 2010

रवि जी, नमस्कार….। आप बड़े ही धुरंदर नजर आ रहे है..। यथार्थ को जिस तरह से परोसता है वह बड़ा ही जीवंत है। मगर जहां का जिक्र कर रहे है, वहा पर ऐसा होता होगा..लेकिन हमारे पंजाब में इतने निरंकुश लोग नहीं है। मैं उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूं. वहां पर भी मुझको ऐसे यथार्थ का दर्शन नहीं हुआ है। यह सच है कि मरने से पहले लोग जिसे पानी पी पी कर गरियाते रहे है..मरने के बाद उसके यार दोस्त और दुश्मन तक गाली जैसे शब्दों से परहेज करने लगते है। डोम की दबंगई का जो चित्रण आपने किया है, वह बिहार जैसे प्रांत की सच्चाई को उजागर तो करता है..लेकिन उसे बदनाम कितना करता है..इसका साइड इफैक्ट उन बिहारी लोगों पर पड़ता है जो देश के अन्य प्रदेशों में कामकाज र रहे होते है। उनको भइया और न जाने कैसे कैसे भद्दे शब्दों से अलंकृत करते है उस प्रदेश के मूल निवासी। कृपया इस तरहे के लेख इस ब्लाग पर न लिखे जो हिंदी भाषी लोगों के लिए गले खी फांस बने। एकाध घटना उस कुल की संस्कृति नहीं बया करती है। इसलिए भविष्य में ऐसा फिर नहीं करेंगे..इसी आशा के साथ मैं आपकों पुन अभिवादन करता हूं।

    naveen vyas के द्वारा
    September 18, 2010

    शायद आपको जीवन के कटु सत्य का सामना करना अखरता है अन्यथा आप इस प्रकार की टिप्पणी नहीं ही करते . आज के समय में क्या यूं.पी क्या बिहार और क्या पंजाब कहाँ लकड़ी से लेकर हांडी तक पैसे को लेकर मगज मारी नहीं है. क्या सरकार का काम सिर्फ बेतन निर्धारण और जमीन अधिग्रहण का रह गया है. और जय राम रमेश को नहीं दिखता की मुर्दा फूकने के नाम पर सबसे ज्यादा प्रदूषण हो रहा है? रविकांत जी साधुबाद

rajeysha के द्वारा
September 9, 2010

इस वि‍षय पर मुंशी प्रेमचंद की एक प्रसि‍द्ध कहानी ” ” का कोई जवाब नहीं।

Soni garg के द्वारा
September 7, 2010

इतना विस्तार से इस सबके बारे में नहीं जानती थी आज पढ़ कर लगा की आपका कहना सही है इसका कोई तो प्रबंध सरकार को करना चाहिए !

आर.एन. शाही के द्वारा
September 7, 2010

बहुत बहुत बधाई । ऐसी और यथार्थपरक रचनाएं देंगे, ऐसी उम्मीद है ।

brajesh shahi के द्वारा
February 22, 2010

very very interesting

rahul sexena के द्वारा
February 22, 2010

this is truth of life.

jaigurudev के द्वारा
February 18, 2010

जय गुरुदेव, हमारी अज्ञानता का फायदा पहले भी उठाया गया और अभी भी उठाया जा रहा है. जीवन औरमौत का भेद पता होता तो ऐसा नहीं होता. शरीर छोट जाने के बाद की कहानी जो की साधना के माध्यम से जीते जी देखी जा सकती है. वो दिख जाये तो मनुष्य इन सब कर्मकांडी और मानवता के दुश्मनों को सबक सिखा सकता है. आत्मा चेतन है और शरीर और संसार जड़ है. शरीर छूट जाने के बाद आत्मा का मृत शरीर से कोई संबंद नहीं रहता यदि निर्दारित आयु के पहले ऐसा हो तो प्रेत योनी मिलती है. इन तथ्यों को कोई जानकार महात्मा ही बता सकता है. जब महात्माओ और संतो का साथ छोड़ दिया तो समस्या बढ़ गयी. जय गुरुदेव नाम प्रभु का

    ravikant के द्वारा
    February 20, 2010

    jaigurudev je, thanks for comments

sunil के द्वारा
February 14, 2010

mene aap ka lekh padha hai ,asal men yah desh aise samay se gujar raha hai jahan par har ek aadmi apni jimmedari se bachata hai .iska nateeja hai corruption .ek corrupt aur gair jimmedar samaj se corrupt aur dusht neta paida hote hain jo ki system ko badalna hi nahi chahte .kuch badalne ke liye ham sabko badalan padega………………………….jalao deeye par rahe dhyan itna andhera dhara par khin reh na jaaye………………………kategi tabhi yah andheri ghiri jab swayam dhar manuj ka deep rup aaye.

ravi के द्वारा
February 12, 2010

thanks for comments

anil के द्वारा
February 11, 2010

sarkar ke liye shram ki baat hai. prashasan to mar chuka hai

richa के द्वारा
February 9, 2010

विचारणीय…

rajeev के द्वारा
February 9, 2010

sach bahut ghinauna hai

daplu, madhubani के द्वारा
February 8, 2010

ज्वलंत मुद्दा उठाने के लिए धन्यवाद

ravikant के द्वारा
February 8, 2010

ranjana je, very very thanks

ranjana के द्वारा
February 8, 2010

good post

anand के द्वारा
February 8, 2010

आपका लेख पसंद आया, आपके पोस्ट का रहता है मुझे इंतजार

ajay के द्वारा
February 8, 2010

इसे बदलने के लिए लोगों को ही आगे आना होगा। गहरी नींद में सोई सरकार इस मुद्दे पर कभी भी जगने वाली नहीं है।

mithu के द्वारा
February 8, 2010

कड़वा सच

praful के द्वारा
February 8, 2010

यह परंपरा हजारों साल से चली आ रही है। आजादी के बाद भी किसी सरकार ने नहीं सोचा कि मरने के बाद कम से शव जलाने में कोई बाधा न पहुंचाए। आज भी विद्युत शव दाह गृह में कोई शव जलाना नहीं चाहता। पारंपरिक विधि से काम कराने पर हर जगह लूट-खसोट होती है। ये दोषी हैं तो हम भी दोषी हैं।

ravi के द्वारा
February 8, 2010

यानी मरने के बाद भी चैन नहीं

anand के द्वारा
February 7, 2010

वास्तव में घाटों पर काफी शर्मनाक स्थिति है। डोम खुद को डोम कह रंगदारी करता है। बड़े-बड़े अधिकारी भी इसके सामने बेबस दिखते हैं।

hemant kapoor के द्वारा
February 6, 2010

सामान्यतः नजरअंदाज कर दिए जाने की प्रवृत्ति के कारण ऐसे लोगों को बढ़ावा मिलता है,ऐसे अवसरों पर जनसामान्य का प्रतिरोध भी सामने आना चाहिए.

raghunath के द्वारा
February 6, 2010

उत्तर प्रदेश में भी यही स्थिति है। सरकार की नजर इसपर नहीं गई है। सरकार को लगता है कि यदि इस व्यवस्था को ठीक भी कर दिया जाए तो वोट नहीं बढ़नेवाला। सो, वह मौन है।

roli के द्वारा
February 6, 2010

this is burning topic for everybody.

rajeev के द्वारा
February 6, 2010

आपने बहुत अच्छा प्रयास किया है इस मसले को उठा कर सही मे आज जन्म लेना इतना मुश्किल नही जितना मरना ये सभी प्रसंग सही हैं रोज़ आस पास ये सब देखा जा सकता है । धन्यवाद्

sanjay. Bagaha के द्वारा
February 5, 2010

मरे लोगों को पैसे की जररत है आपने बिल्कुल सह बात कही है।

richa के द्वारा
February 5, 2010

good post

siddharath, mumbai के द्वारा
February 5, 2010

Slowly – slowly myth is shattered. But just take a long time. They take advantage of superstition.

shashwat के द्वारा
February 5, 2010

गरीब व्यक्ति हर जगह झटका खाता है. यहां भी नहीं बक्श रहे हैं

putul,delhi के द्वारा
February 5, 2010

रविकांत जी, इस तरह की समस्या लगभग हर जगह है। ऎसा लगता है कि सरकार कई चीजों पर नियंत्रण ही खो चुकी है। यदि स्वेच्छा से कोई कुछ देता है तो कोई बात नहीं। परंतु जबरदस्ती करना गलत है। यह भी सही लिखा है कि हम आज भी अंधविश्वास में जी रहे हैं। मरने के बाद प्रेम जाग जाता है, कई बेटे तो अपने मां-बाप के साथ नौकर से भी बदतर व्यवहार करते हैं, पर उनके मरने के बाद क्रियाक्रम धूमधाम से करते हैं।

manoj के द्वारा
February 5, 2010

समाज में जीना भी मुश्किल है और मरना भी. आपके लिख ने यह तो स्पष्ट कर दिया कि जो आज तक सुना था वह मिथक नहीं था. यह एक ऐसा सत्य है जो शायद ही कोई ध्यान मे रखता है.

shankar, film के द्वारा
February 5, 2010

विचारणीय आलेख, अगले का बेसब्री से इंतजार

Eeshan के द्वारा
February 5, 2010

तीखा सत्य, व्यवस्था को तमाचा


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